Yogi Anurag

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यों तो विश्वभर के तमाम वैद्यक देवराज “इंद्र” के ही कृपापात्र शिष्य हैं, किंतु फिर भी, ज्ञात नहीं पड़ता कि बाबा ने स्वयं को कभी “इंद्र” का शिष्य कहा हो। ना ही ये कौंधता है कि स्वयं को कभी “आयुर्वेदाचार्य” ही कहा हो। कभी नहीं!
यहाँ तक कि ऐसे युग में जहां दो चार योगासान सीख कर “योगाचार्य” की उपाधि धारण करने वालों की बाढ़-सी है, यहाँ भी बाबा स्वयं को निष्णात नहीं मानते, केवल योग का एक कमतर शिष्य मानते हैं, जो कभी किसी योगासन को निर्मित करने का तो दूर, खोजने का श्रेय भी नहीं लेते।
और सबसे बड़ी व सबसे अलग बात ये कि वे हज़ारों लोगों के गुरु हैं, किन्तु उनकी शान में कहीं कोई आरती-वंदना नहीं। ये मानवीय स्वभावों के ऊपर बाबा की नैतिक विजय है!
यद्यपि ये कहना व्यक्तिपूजक शैली में प्रशंसा का द्योतक होगा, जिसके पाश से स्वयं को बचा ले जाना एक साहित्यकार के लिए बड़ा आवश्यक गुण होता है, तथापि, सत्य यही है कि बाबा रामदेव “तेरा तुझको अर्पण” भाव के जीवंत आख्यान हैं, लिविंग-लीजेंड!
वे “आयुर्वेदाचार्य” नहीं और न ही “योगाचार्य”, तब फिर वे हैं क्या?
वे एक उत्साही संन्यासी हैं, जिसका कि मन बालसुलभ। उद्योगपति हैं, किंतु बनियों सा नपा-तुला व्यवहार नहीं। उत्पादों का मूल्य निश्चित करने में किफ़ायती हैं, मग़र शब्दों के व्यापार में शाहख़र्च। वादों का पूरा होना न होना वक़्त की योजना है, मग़र वादे करते वक़्त हाथ तंग करना बाबा की शैली नहीं। वादों की मुट्ठी भरते हैं, तो लगता है कि कृष्ण की भाँति भारतीय जनमानस को समूचा बैकुंठ ही दे बैठेंगे।
वस्तुतः उनका यही उत्साही बालमन उनकी आलोचनाओं का आधार बन गया है। कैसी भाँति भाँति की आलोचनाएँ होती हैं, आप लोग सब जानते ही हैं। उन आलोचनाओं का पुनर्लेखन कर समय व शब्द नष्ट करने का कोई लाभ नहीं!
अक़्सर बाबा की आलोचना होती है कि वे “लाला” हो गए, व्यापारी हो गए। इस आधारहीन आलोचना के शमन हेतु एक प्रयोगात्मक स्थिति पर ग़ौर करें :
एक ग्राम व आसपास के कुछ ग्रामों के स्वास्थ्य की चिंता करने वाले वैद्य जी को किसी “टीम” की आवश्यकता नहीं पड़ती। वे अकेले पूरा प्रबंधन देख लेते हैं। किंतु जिस व्यक्ति को समूचे राष्ट्र के आयुष्य की चिंता करनी है, उसे वो सबकुछ चाहिए होगा, जो बाबा ने निर्मित किया है।
ये कुछ कुछ वैसे ही है, जैसे परिवार के मुखिया को मंत्रिमंडल नहीं चाहिए, किन्तु देश के मुखिया को चाहिए। चूँकि ज्यों ज्यों नियंत्रण का क्षेत्र बढ़ता है, मनुष्य की व्यक्तिगत शक्ति कमतर होने लगती है।
क्या वाक़ई आपको लगता है कि एक मनुष्य अकेला, बिना किसी उद्योग व यंत्र-तंत्र के देशभर में आयुर्वेदिक औषधियों का बोलबाला क़ायम कर सकता है। क्या वाक़ई आपको ऐसा लगता है, स्वयं विचार कीजिएगा!
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बाबा का पूरा औद्योगिक साम्राज्य आचार्य बालकृष्ण के नाम पर पंजीकृत है, यानी कि सार्वजनिक चेहरा स्वयं बाबा हैं, किंतु काग़ज़ी स्वामित्व आचार्य के पास है।
सुखद आश्चर्य है कि दोनों गुरु-शिष्य के बीच किसी तरह का कोई मतभेद नहीं। यदि है भी, तो वो वार्ताकक्ष से निकल कर मीडिया तक की यात्रा नहीं करता है। धनलोलुप हो चुकी सदी के समक्ष, वैसा उद्धरण स्थापित करना भी, बाबा की नैतिक विजय है।
किंतु यहाँ दो प्रकार की मतभिन्नता भी अपना स्थान ग्रहण करती है :
१) अव्वल तो आदरणीय हुतात्मा श्री राजीव दीक्षित जी के असमय अवसान का मुद्दा, जहां एक पक्ष का कथित मानना है कि बाबा की भूमिका संदिग्ध थी।
बहरहाल, श्री दीक्षित एक पृथक् लेख का विषय हैं, बल्कि कहूँ पृथक् पुस्तक का विषय हैं। किंतु उनके व्यक्तित्व की विशालता इस सच को नहीं दबा सकती कि उनके शत्रुओं की एक लम्बी सूची थी। और ठीक वैसी ही एक लम्बी सूची उन लाभों की भी है, जो उनकी उनकी मृत्यु से अनगिनत लोगों को हुए।
अतः वैसी संभावना से दो टूक इनकार तो नहीं है, किंतु फिर भी, श्री दीक्षित की हत्या का आरोप सीधे सीधे बाबा पर लगा देना न्यायसंगत बुद्धि का अभाव है। शेष चर्चाएँ श्री दीक्षित के विषय में पृथक् लेख में होंगी।
२) दूसरा विवाद है, हाल ही में आचार्य बालकृष्ण का विषाक्त पदार्थ के कारण हस्पताल पहुँच जाना!
ये भी विचारणीय है कि किस विधि “पतंजलि” के काग़ज़ी सर्वेसर्वा को मार्ग से हटाने की योजना बनाई गई।
जहां तक इस विषय में मेरा अन्वेषण है, समझता हूँ कि बाबा रामदेव का सांसारिक परिवार यानी कि उनके बंधु-बांधवों व आचार्य के बीच मानसिक संघर्ष हो रहा है, जिसमें बाबा की भूमिका भीष्म जैसी है : प्रतिज्ञाबद्ध, वचनबद्ध, दयनीय व असहाय!
किंतु इन तमाम दुर्भाग्यों, विपत्तियों व क्लेशों में कुलज़मा भी वो शक्ति नहीं, जो बाबा के भीष्म-पराक्रम को ग्रास बना लें।
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ये बाबा का भीष्म-पराक्रम ही है कि फ़िलहाल “पतंजलि” के पास अपनी साढ़े चार हज़ार करोड़ की बुनियाद है, जिसे आप किसी उद्योग की अचल सम्पत्ति कह सकते हैं, जिसमें मशीनरी आदि संसाधन शामिल होंगे।
और तक़रीबन पाँच हज़ार करोड़ से ज़्यादा की सालाना महसूली है, जोकि बाबा के द्वारा सन् 2016 से ही दस हज़ार करोड़ तक लक्षित की जा रही है, किंतु बात अभी सात-आठ तक ही पहुँची है।
इन तमाम ग़ैरज़रूरी-सी बातों के बीच, काम की बात ये है कि बीते बरस का शुद्ध लाभ छः सौ करोड़ है!
अर्थात् भारत के प्रत्येक व्यक्ति ने यदि “पतंजलि” के उत्पाद लेकर विशुद्ध लाभ में पाँच रुपए का भी योगदान दिया होगा, तो उतना लाभ होगा। केवल हिंदुओं का योगदान होगा तो छः रुपए, आधे हिंदुओं का होगा तो बारह, चौथाई का होगा तो चौबीस।
यानी कि बाबा आपसे केवल चौबीस रुपए का लाभ ले रहे हैं। और इस लाभ के एवज में वे क्या कर रहे हैं, ये देखने वाला विषय है।
प्राचीन काल से ही मनुष्य की अर्थव्यवस्था और स्वर्ण का कुछ ऐसा विशेष ताल्लुक़ है कि एक परिवार को शाहखर्ची से कुछ कम एवं किफ़ायत से कुछ ज़्यादा की जीवन शैली के अनवरत निर्वाह हेतु प्रतिमास एक तोला स्वर्ण चाहिए।
ये तथ्य आज भी ज्यों का त्यों है! एक परिवार को चलाने में चालीस हज़ार रुपया महीना लगता ही है।
यानी कि यदि “पतंजलि” के शुद्ध लाभ और बाबा के इस औद्योगिक प्रकल्प से लाभ लेने वाले लोगों को संख्या का आनुपातिक विश्लेषण किया जाए, तो लगभग डेढ़ लाख परिवार होंगे।
— इस पूरे प्रकरण का लक्ष्य डेढ़ लाख का गुणा चालीस हज़ार से कर छः सौ करोड़ का आँकड़ा बनाकर तर्कसिद्धि का नहीं है, बल्कि वैसी न्यायबुद्धि विकसित करने का उद्देश्य है कि किसी उद्योग के सामाजिक लाभों की गणना कैसे की जाती है।
क्या लगता है आपको, “पतंजलि” के प्रकल्प से केवल डेढ़ दो लाख लोगों को ही रोज़गार मिलता होगा? अब बताएँ, जिस संसार में एक भूखे को भोजन प्रदान कर देने वाला पुण्य का भागी हो जाता है, वहाँ डेढ़ लाख परिवारों के चूल्हे में ईंधन भरने वाले बाबा को खलनायक किस विधि मानें!
वैसी कठोरता हमसे तो न हो सकेगी, यहाँ तक कि सहिष्णुता के लिए जगत्प्रसिद्ध सनातन धर्म के किसी अनुयायी से न हो सकेगी।
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आलेख के संझाकाल में तमाम तकरीरों को समेटने बैठें, तो कहना होगा कि बाबा रामदेव अपने आप में एक संकुल हैं, एक संपुष्टि हैं। यानी कि कंप्लीट पैकेज, एक भरा-पूरा पुलिंदा, जो वैदिककालीन आयुष्य विद्याओं को समेट कर बनाया गया है।
आयुष्य विद्याओं की बात करें, तो बात पुनः “क्यूरेटिव” और “प्रिवेंटिव” की कसौटी में जा गिरती है। “क्यूरेटिव” यानी कि रोग का नाश और “प्रिवेंटिव” यानी कि रोग के कारण का नाश।
बाबा के पास आयुर्वेद का शास्त्रज्ञान है। या कहें कि उनके पास आचार्य बालकृष्ण जैसा शिष्य है। जाहिर है, वे समाज के लिए एक गुणी “क्यूरेटर” साबित हो रहे हैं, तमाम रोगों का शमन कर रहे हैं।
कथाएं तो यहां तक प्रचलित हैं कि लोग उनके आश्रम में निवास कर कैंसर जैसी बीमारियों को पराजित कर आए हैं! यदि वैसा है, तो ईश्वर दोनों गुरु-शिष्य को दीर्घ आयुष्य प्रदान करें। ताकि वे एक लंबे कालखंड तक समाज को निरोगी करते रहें।
और जहां तक रही बात “प्रिवेंटर” की, तो वे बाबा स्वयं हैं। उनका योग इस संशय को प्रत्याभूत करता है कि आप बीमारियों से ग्रस्त न होंगे। यदि आयुवृद्ध होने के कारण आप बीमारियों के कुचक्र में फंसते भी हैं, तो आयुर्वेद है न, उसकी शरण में आइए।
कुलमिला कर लब्बोलुआब ये है कि बाबा प्राच्य आयुष्य विद्या की समग्र संपुष्टि लेकर आए हैं! और कुछ वामी-कामी खल तत्व वैसी संपुष्ट चेतना के ईंधन से जलते दीपक को बुझाना चाहते हैं।
चूँकि वैसे आयुर्वेदिक चरित्र को उठने में कई सदियां लगी हैं। इस बार जो मंशा अपूर्ण रही, तो सम्पूर्ण आयुर्वेद का विलोपन ठीक उसी तरह हो जाएगा, जैसे आयुर्वेदिक शल्य चिकित्सा का हो गया है। समय का आग्रह है कि फिलहाल दीपक को न बुझने दिया जाए।
वो मंदिर का दीप, उसे नीरव जलने दो!
इति नमस्कारान्ते।
✍️Yogi Anurag

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