lalu ke village ki history

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ये पोस्ट लालू के शासन में बिहार के हर गांव की कहानी कहती है कम से कम मेरे गाँव की और आसपास के जितने राजपूत या स्वर्ण गाँव थे सबकी कहानी कहती है । मेरे बचपन में लालू सरकार आई थी और जवानी में गई । मैं ये नही कहता कि और लोग सुख चैन से थे पर स्वर्ण समाज लालू के टारगेट पर था । क्षेत्र में पहला मर्डर हुआ था वो थे हमारे अपने गाँव रसलपूर के शेर बाहुबली शंभुशरण सिंह थे उनके बलिदान के बाद पूरे क्षेत्र से राजपूतो को चुन चुन कर शाहिद किया गया । हमारे क्षेत्र के बुद्धिजीवी भाई लोग को आजकल लालू जी के सुपुत्र जो शायद 10 पास है उनमें जननायक दिखाता है तो भैया अपने ज्ञान चछछू खोले क्योंकि DNA वही है पढ़ा लिखा थोड़ा कम है । मैं आज बड़े और छोटों को टैग करूँगा पोस्ट जरूर पढ़ें
लालूजी का स्वराज …?
नब्बे के दशक की बात है । सामाजिक न्याय के प्रतीक पुरुष बिहार की सत्ता पर आसीन हो चुके थे । बिहार में न्याय प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी , जो प्रवाहित होकर मेरे गांव तक आ पहुंची थी । मेरा गांव जो लगभग ब्राह्मण और यादवों के बीच आधा-आधा विभक्त है, कुछ छोटी मोटी जातियों के सिवा, शांति से जीवन जी रहा था । छोटे मोटे संघर्ष तो गांव में होते ही रहते हैं, पर सामाजिक तानाबाना अटल था । धीरे-धीरे हत्याएं शुरू हुईं । और गांव का माहौल खराब होने लगा । अचानक ब्राह्मण आततयी सिद्ध हुए और उन्हें मारने पीटने, पददलित करने का क्रम आरंभ हुआ ।
1993 की बात है । मैं पटना कॉलेज से स्नातक होकर घर लौट आया था । एक शाम को मेरे मौसा के घर पर गोली चलने की खबर आई । जब तक हम दौड़ कर वहां पहुंचे तब तक गोली चलाने वाले भाग चुके थे । पता चला सतीश यादव ने मौसा के छोटे भाई शिबु भैया पर निशाना साधा था, वहां दालान पर कुछ लोग बैठे थे, जिनमें उनका बच्चा भी था। गोली निशाने से चूक गई और सभी सुरक्षित रहे । गांव में कोहराम मच गया । लेकिन धीरे-धीरे बात आई गई हो गई । पर सतीश यादव महिषासुर की भांति प्रबल होता गया । उसने अगले एक वर्ष में नृशंस हत्याएं कीं । कुछ को पूछ-पूछ कर काटा कि बताओ तुम्हें कहां से काटूं ।
1994 के अगस्त तक मैं दिल्ली आ चुका था । गांव से खबर मिलती रहती थी । एक दिन अचानक समाचार मिला कि मेरे माता-पिता गांव से दिल्ली प्रवास पर आ रहे हैं । क्यों आ रहे हैं यह मुझे मालूम नहीं था । बाद में यह ज्ञात हुआ कि 1995 की एक शाम को जब मेरे पिता अपने बाल्यकाल के मित्र शुभंकर भैया के द्वार से लौट रहे थे, तब सतीश यादव ने उन्हें मंदिर के पास रोका । मेरे पिता को इस तरह से रोकने की हिम्मत किसी में नहीं थी, इसलिए नहीं कि वे बाहुबली थे, इसलिए कि उनका प्रभामंडल अपनी ही अर्जित कमाई से दमकता था । उसने मेरे पिता के कुरते को पकड़ा और एक तमाचा जड़ दिया । गांव स्तब्ध रह गया । आसपास जो लोग मौजूद थे उन्हें काठ मार गया ।रामकृष्ण भैया दौड़े और कातर होकर उन्होंने कहा कि सतीश तुमने अनर्थ कर दिया ! मेरे पिता घर लौटे तो कांप रहे थे और मां स्तब्ध थीं । मेरा विशाल कुनबा कराह उठा । अवर्णनीय दुख का घूंट पीकर हम ज़िदा रहे । पल पल मैं उस राक्षस की मृत्यु के बारे में सोचता रहा । यह घटना लालूजी के राज में अनाचार की पराकाष्ठा थी । किसी ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि गोसाईंगांव में रुद्रनारायण झा के साथ कोई इस तरह की बदसलूकी कर सकता है । पर जहां हत्याएं आम थीं वहां एक तमाचे को क्या तौलना ?
तथापि बताना चाहता हूं कि मेरे पिता प्राध्यापक रहे हैं । पच्चीस किलोमीटर की परिधि में उनका सम्मान रहा है । मैं जब भी उनके साथ बाजार गया, रास्ते में कम से कम पचास लोग उन्हें प्रणाम करने वाले मिले । उन्होंने अपने जीवन में चीटी का भी अहित नहीं किया। वेद प्रताप वैदिक के साथ स्कूल ऑफ इंटरनेशनल रिलेशंस (तब सप्रू हाउस) से पीएचडी करने वाले मेरे पिता ने गांव में रहने का चुनाव किया । उनके पास लंदन जाने का प्रस्ताव था पर दादी के लिए उन्होंने सब त्यागा । वहीं रहे । पास के कॉलेज में पढ़ाया। अपने संस्कार से सम्मान अर्जित किया । अपशब्द उनकी ज़ुबान पर कभी नहीं आए । अपनी माता से अनन्य प्रेम किया । पढ़ने लिखने वाले अध्यवसायी व्यक्ति ने दूसरों को पढ़ाया पर लालू जी के समरसता राज में अपमानित हुए । आज तक मैंने यह कभी सार्वजनिक नहीं किया पर आज कर रहा हूं । मेरा मन कचोटता है, अब तक मैं उस अपमान को भूला नहीं हूं फिर सोचता हूं कि किसी हत्यारे के हाथों उनका क्षरण नहीं होता । इस पोस्ट को लिखते हुए मेरी आंखों में आंसू हैं पर क्या करूं, यही सच है ।
मेरे पिता गांव छोड़कर दिल्ली आ गए । सतीश यादव कुछ साल के बाद बर्बर मौत मारा गया पर बिहार में सतीश यादव रक्तबीज की तरह पैदा हुए। पटना में जीवन सरल नहीं रहा । कभी भी किसी का अपहरण, हत्या आम बात थी । व्यापारियों से हफ्तावसूली दिनचर्या थी । साधु यादव के साधुत्व में पटना के कई सारे शोरूम्स बंद हो गए । फ्रेजर रोड पर रोल की प्रसिद्ध दुकान मेफेयर वाले को गोली मार दी गई । यह सब सामान्य था । लालू जी के राज ने बिहार एक गाली के रूप से विभूषित हुआ । लोगों से ये कहते हुए शर्म आने लगी कि बिहार का रहने वाला हूं । अनगिन हत्याएं और अपराध हुए पर मीडिया ने तलवे चाटे । मसखरा मानव लोगों को हंसाता रहा । अब मसखरा मानव के पुत्र तैयार हो रहे हैं और बिहार फिर से सज्ज हो रहा है । क्योंकि लालूजी के साथ न्याय नहीं हो रहा है । आधुनिक भारत के इतिहास में लालू राज से खराब कुछ हो ही नहीं सकता । वह त्याज्य ही नहीं पश्चाताप के योग्य है । उससे खराब और वीभत्स राजनीतिक व्यवस्था इस देश ने नहीं देखी है । लालू जैसे नेता लोकतंत्र के लिए अभिशाप हैं ।

साभार देवांशु झा जी …..