Higher education

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उच्चतर शिक्षा और इस शिक्षा को पाने के बाद भी युवाओं की बेरोजगारी के लिए सरकारों को दोष दिया जाता रहा है। सरकारों की अकर्मण्यता को जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है।

लेकिन क्या केवल सरकारें ही दोषी हैं ?

आम जनता का एक अंग जो इस उच्चतर शिक्षा को छात्रों को प्रदान करता है। शिक्षक क्या उनका भी दोष है। आज इसी पर मेरी कही :

सन 1991 में आर्थिक उदारीकरण के बाद बड़ी तेजी से औद्योगीकरण हुआ। देसी विदेशी कितनी ही कम्पनियाँ नयी लगी। जिनमे तकनीकी और प्रोफेशनल लोगों की जरूरत थी।

सन 91 तक भारत में 5 IIT , इतने ही IIM , कुछ सौ सरकारी इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट कालेज थे। और कुछ सौ ही दक्षिण और महाराष्ट्र में निजी तकनीकी कालेज थे।

और ये कालेज आने वाली जरूरत को पूरा नहीं कर सकते थे। केंद्र सरकार ने स्थिति को समझते हुए बड़ी तेजी से भारत में केंद्रीय इंजीनियरिंग कालेजों की स्थापना की। आज लगभग हर प्रदेश में IIT है। केंद्र की विभिन्न सरकारों ने इलेक्ट्रॉनिक्स , आईटी फील्ड के लिए पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप में ढेरो IIIT भी खोले।

राज्य और केंद्र सरकारों की बराबर हिस्सेदारी वाले रीजनल इंजीनियरिंग कालेजों को केंद्र सरकार ने पूरी तरह अपने हाथ में लेकर उन्हें NIT बना दिया।

इसके अलावा ढेरो सेन्ट्रल यूनिवर्सिटीज भी खोली गयी।

चूँकि राज्य सरकारों के पास लिमिटेड बजट होता है। इसलिए केंद्र में रही विभिन्न सरकारों ने स्वंय अपने बजट से ढेरो कालेज खोले जिनकी गुणवत्ता श्रेष्ठ बनी हुई है।

इनके अलावा राज्यों ने भी स्टेट इंजीनियरिंग कालेज खोले। और दक्षिण के अलावा लगभग हर राज्य में निजी कालेजों की बाढ़ भी आयी।

आज भारत में 4000 के आसपास इंजीनियरिंग कालेज हैं।

कुछ सौ से 4000 .

कुछ सौ से निकलने वाले छात्रों में गुणवत्ता थी , ज्ञान था। उन्हें कभी नौकरी की समस्या नहीं रही।

लेकिन संख्या बेतहाशा बढ़ने के बाद वही गुणवत्ता बरक़रार न रह सकी।

सरकारों की नजर में ये बात शुरू से थी। जब नए नए कालेज 90 के दशक में खुल रहे थे , तब उनमे पढ़ाने के लिए योग्य शिक्षक मिलने मुश्किल थे। बीटेक पास बीटेक को पढ़ा रहे थे। MTech और PhD कराने के लिए कालेज ही नहीं थे। इसलिए सरकारों ने शुरू में ढील रखी।

लेकिन 2000 के बाद सरकारों ने नकेल कसनी शुरू की। सरकार ने पहला नियम ये बनाया की शिक्षकों को असिस्टेंट प्रोफ़ेसर से प्रोफ़ेसर पद पर तरक्की के लिए पीएचडी करना अनिवार्य कर दिया।

अर्थात प्रमोशन पाना है, सैलरी बढ़वानी है तो सरकारी कालेज हो या निजी , PhD करना जरूरी हो गया।

इसके अलावा सरकार ने ये भी नियम बनवा दिया की पीएचडी के लिए रेपुटेड जर्नल्स में दो रिसर्च पेपर्स छपवाने अनिवार्य कर दिए। कमसेकम दो रिसर्च पेपर।

इसके पीछे सरकार की मंशा यही थी की एक सब्जेक्ट विशेष में रिसर्च किया आदमी , वैसे विषयो पर बेहतर शिक्षा दे सकेगा। छात्रों को भी रिसर्च के लिए मोटिवेट कर सकेगा। इसके लिए AICTE के जरिये कॉलेजों को ढेरो आर्थिक मदद दी गयी। MTech और PhD छात्रों के लिए स्टीपेन्ड बढाए गए।

एक सरकार जो और जितना जरूरी था , वो कर रही थी।

लेकिन एक दिक्कत थी।

शिक्षक बनने के बाद , आदमी या महिला में आगे पढ़ने का जोश खत्म हो चुका होता है। चाहे स्कूलों में पढ़ाते शिक्षक हों या कॉलेजों में। इंजीनियरिंग कॉलेजों में तब भी थोड़े बहुत शिक्षक मिल जायेंगे जो पढ़ते रहते हैं , नए नए सब्जेक्ट , तकनीकों से खुद को समृद्ध रखते हैं। लेकिन ज्यादातर नहीं। उनका काम केवल क्लास लेना है।

फिर ऐसे शिक्षक पीएचडी कैसे कर पाते।

क्या कोई तरीका हो सकता था ?

कुछ पैसा खर्च करके कुछ जुगाड़ करके ?

फिर भारत में एक नयी इंडस्ट्री ने जन्म लिया।

रिसर्च जर्नल्स जिनमे ऐसे रिसर्च पेपर्स छपते हैं। जो पूरे विश्व में जाने जाते हैं। जिनमे रिसर्च पेपर का छपना बेहद तारीफ की बात माना जाता है। जो हर छपने वाले पेपर की पूरी जाँच पड़ताल करते हैं। जिनका हर विषय पर अपना एडिटोरियल बोर्ड होता है , जिनमे विश्व के नामी विशेषज्ञ होते हैं। औरयही जर्नल्स पेपर छापने से पहले नेशनल और इंटरनेश्नल्स लेवल पर कांफ्रेंसेस करवाते हैं जहाँ रिसर्चर अपने पेपर पढ़ते हैं और उन्हें डिफेंड करते हैं।

ऐसे नामी जर्नल्स भला फर्जी , निम्न स्तर के रिसर्च पेपर क्यों छापते। पैसा लेकर भी नहीं छापते।

फिर भारत में जहाँ अपना कोई प्रोडक्ट मुश्किल से बन पाता है लेकिन नकली दूध , मावा , दवाई बेहद आसानी से बन जाती है। वहां नकली , डूबियस या विज्ञानं की भाषा में प्रीडेटरी जर्नल्स का शुरू हो जाना क्या बड़ी बात थी।

कुछ पैसा लेकर अपने जर्नल्स में रिसर्च पेपर छापने वाले लोगों की बाढ़ आ गयी। कुछेक नहीं , कुछ सौ नहीं कई हजार।

और ये जर्नल्स केवल इंजीनियरिंग के लिए ही नहीं थे , पीएचडी तो मजबूरी में हर विषय में शिक्षक लोग कर रहे हैं। समाज शाश्त्र , कामर्स , फिजिक्स , हिस्ट्री हर विषय पर।

UGC आमतौर पर पीएचडी के लिए गाइड लाइंस बनाता है। उसने तय किया की हम कॉलेजों को बतायेंगे की उन्हें कौन से जनरल्स में पेपर छपवाने चाहिए।

लेकिन UGC में हर सब्जेक्ट के स्पेशलिस्ट नहीं , न इतनी मैनपावर है। उसने यूनिवर्सिटीज से टॉप के जर्नल्स की लिस्ट मांगी।

जो 1009 नाम आये उनमे 88 % फर्जी जर्नल्स निकले। केवल 112 जनरल्स क्वालीफाई कर पाए। बाकी में अधिकतर कागजो पर थे। हकीकत में कहींउनका पता नहीं था।

और ऐसे जनरल्स केवल भारत में ही नहीं हैं , चीन और शेष दुनिया में हैं। लेकिन 27% प्रीडेटरी जर्नल्स और 35% ड्यूबियस पेपर्स का ओरिजिन भारत में है।

ऐसे शिक्षक , वैज्ञानिक क्या शिक्षा और रिसर्च करेंगे। उनके छात्रों का ज्ञान कितना होगा।

हम हर समस्या को सरकारी समस्या समझते हैं , उसके समाधान की सरकारों से उम्मीद करते हैं। लेकिन खुद को कभी नहीं देखते। खुद के योगदान पर, समस्या का अंग होने पर नहीं सोचते।

सरकार कितने ही अच्छे कालेज बना दे , लेकिन शिक्षक तो हमारे समाज से ही आने हैं। अगर वही अपनी जिम्मेदारी न निभाएं। फिर उच्चतर शिक्षा के क्षेत्र में हम कैसे आगे बढ़ेंगे ?

आज इंजीनियरिंग पास किये बच्चे इंडस्ट्री में सीधे जाने लायक नहीं माने जाते। उसका एक महत्वपूर्ण कारन उनको मिली शिक्षा में है जो इसलिए बर्बाद है क्योंकि बेईमानी हमारा प्रमुख लक्षण है।