हिन्दू मैरिज एक्ट

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एक अति आवश्यक पोस्ट है, पढ़ें और लोगों तक पहुंचाए।

हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 (#Hindu_Marriage_Act_1955) का पूर्ण सत्य: भारत का एक अनलिखा काला इतिहास – भाग १
लेखक -डॉ श्री सुनील वर्मा

हिन्दुस्तान पर सैकड़ो वर्षो तक राज करने के पश्चात् अंग्रेजी हुकूमत को अहसास होने लगा था कि अब देश छोड़कर जाना निश्चित है| भारत देश को पुरी तरह चूसा जा चुका था और उनको अब चूसने के लिए कुछ दिखाई नहीं देता था| इसके उलट भारत उनके लिए एक लायबिलिटी बनता जा रहा था | दिल्ली से लेकर लन्दन तक मीटिंग्स का दौर जारी था और चर्चा का विषय था भारत को छोड़ कर जाने की भूमिकाये बनाना और तैयारियां करना | भारत को पूरी तरह लूटने खसोटने के बाद अंग्रेजो का मकसद सिर्फ एक होता जा रहा था कि किस प्रकार इस देश की spiritual and cultural heritage को पूरी तरह नष्ट करके इतना पंगु बना कर छोड़ा जाये कि आने वाले हजारों वर्षों में भी भारत वह सेल्फ एस्टीम प्राप्त न कर सके जो उसने हजारों वर्षो की गुलामी के पश्चात् भी नहीं खोया था | इसके लिए अंग्रेजो ने एक जबरदस्त प्लान बनाई थी, जिसे कई चरणों में पूरा किया जाना था |

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पहला चरण: अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम

आजादी से करीब सौ वर्ष पहले १८३५ में ही ब्रिटिश भारत के तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड विलियम बेंटिंक नें भारत में “अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम” की संस्तुति दे दी थी | यही वह वर्ष था जब वर्तमान भारत में infamous लार्ड मैकाले ने ब्रिटिश पार्लियामेंट में दिए अपने भाषण में कहा था –

“I have traveled across the length and breadth of India and I have not seen one person who is a beggar, who is a thief. Such wealth I have seen in this country, such high moral values, people of such calibre, that I do not think we would ever conquer this country, unless we break the very backbone of this nation, which is her spiritual and cultural heritage, and, therefore, I propose that we replace her old and ancient education system, her culture, for if the Indians think that all that is foreign and English is good and greater than their own, they will lose their self-esteem, their native self-culture and they will become what we want them, a truly dominated nation.”

भारत को तोड़ने की पहली चरण की योजना के अनुसार, अंगरेजी शिक्षा अधिनियम भारत में लागू कर दिया गया था |

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दूसरा चरण: भारत देश का हजारों जातियों में बटवारा

“अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम” के लागू होने के बाद भारतीय संस्कृति की रीढ़ के हड्डी तोड़ने के लिए अंग्रेजो ने जो दूसरा प्रहार किया वह था भारत के लोगो को जाति के नाम पर इतने टुकडो में बाँट देना जिसकी कि कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था | H. H. Risley जैसे अंगरेजी अधिकारियों ने इसके लिए दिन रात एक कर रखा था | अलग अलग किताबे लिख कर भारतवासियों को हजारों अलग अलग कास्ट में बांटा जा रहा था | यहाँ तक कि आदमियों की लम्बाई का नाक की चौडाई से अनुपात निकाल कर विभिन्न जातियों की उत्पत्ति की जा रही थी | 1860 और 1920 के बीच, अंग्रेजो नें इस कार्य को भी पुरी तरह अंजाम दे दिया और हिन्दुस्तान की पुरातन कर्म प्रधान वर्ण व्यवस्था को पुरी तरह नष्ट कर दिया |

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तीसरा चरण: आरक्षण देकर और न देकर विभिन्न जातियों में मनमुटाव, द्वेष

इतने पर भी अंग्रेजों का मन नहीं भरा ! भारत के लोगो का हजारों जातियों में विभाजन करने के पश्चात् पहले कुछ वर्षो तक उन्होंने जानबूझ कर केवल उच्च जातियों के लोगों को प्रशासनिक एवं वरिष्ठ नियुक्ति देना शुरू किया, ताकि अन्य जातियों में रोष पैदा हो सके | परिणाम यही होना था और यही हुआ कि विभिन्न तथाकथित लोवर जातियों के लोगों में रोष फ़ैल गया | भारत अब आपसी नफरत के हिसाब से बटने लगा था |

1920 के आते आते अंगरेजी हुकूमत नें पलटी मार डी | इसके अंतर्गत अब उच्च एवं सरकारी पदों पर लोअर कास्ट के लोगो को ही आरक्षण दिया जाने लगा | ऊँची जाति के लोगो को यह बात नागवार गुजरी | आगे क्या क्या हुआ, और क्या हो रहा है; आप सब को पता ही है |

इस सारी उथल पुथल का परिणाम यह हुआ कि पहले ही जातियों में बाँट दिए गए भारत के लोग अब एक दुसरे की जातियों से भी अपने अपने हिसाब से नफरत करने लगे | भारत छिन्न छिन्न हो रहा था !

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चौथा और अंतिम चरण: सनातनी “धर्मशास्त्र” सम्मत पारिवारिक व्यवस्था का पूर्ण विनाश

१९२० आते आते १८३५ के अंग्रेजी शिक्षा अधिनियम का प्रभाव दिखने लगा था| अब तक भारत में जाति प्रथा भी पूर्ण रूप से स्थापित हो चुकी थी | वसुधैव कुटुम्बकम की प्राचीन संकल्पना दम तोड़ने लगी थी |

Twincle twincle लिटिल स्टार पढ़-पढ़ कर नयी पीढी के आंबेडकर, गाँधी, नेहरु, B. N. Rau, जिन्नाह जैसे आधुनिक पीढी के तथाकथित विद्वान् उदयमान होने लगे थे | यें विद्वान् रंग रूप और दिखने में तो भारतीयों जैसे ही लगते थे किन्तु इनके कण कण में जैसे अंग्रेजियत बसी हुयी थी | अंग्रेज खुश थे क्योकि इन्ही होनहार बिरवान सिपाहियों के माध्यम से ही तो उनको आगे की शातिर कूटनीति को अंजाम देना था | यह कूटनीति थी भारत की मजबूत पारिवारिक वयवस्था को चकनाचूर कर देना |

अंग्रेजो नें भांप लिया था कि भारत देश को जातियों में बाटने के बाद भी, उनकी पारंपरिक शिक्षा को नष्ट करने के बाद भी, भारतीय समाज का एक सबसे प्राचीन, सबसे मजबूत स्तम्भ परिवार – जो अभी भी पुरातन “धर्मशास्त्र” के अनुरूप ही चल रहा था, जीवित था | याद रहे, यह वही “धर्मशास्त्र” था जिसकी हानि होने पर यदा कदा कृष्ण जैसे वीरों ने भारत भूमि पर जन्म लिया था |

अंग्रेजो को अहसास हो गया था कि जब तक यह सनातनी “धर्मशास्त्र” भारत में है, भारत के लोगो की आत्मा में है, समाज में है, और समाज की सबसे छोटी और सबसे महत्वपूर्ण इकाई, “परिवार” और “पारिवारिक व्यवस्था” में है, तब तक भारत की इस धरती पर कृष्ण जन्म लेते रहेंगे, और सामाजिक अभ्युदय करते रहेंगे |

भारत भूमि को स्थाई रूप से पंगु बनाने के लिए इन्ही कृष्णो को जन्म लेने से रोकना था | इसी “धर्मशास्त्र” का विनाश करना अंगरेजी हुकूमत का अगला लक्ष्य था और भारत की इसी सनातन धर्मी पारिवारिक व्यवस्था को पूरी तरह तोड़ कर रख देना ही अंग्रेजो का अंतिम लक्ष्य था|

यही वह समय था जब भारत के इतिहास का सबसे क्रूर, सबसे विनाशकारी अध्याय चुपके से शुरू हुआ, जिसका दूरगामी परिणाम था नेहरु और आंबेडकर जी का ड्रीम प्रोजेक्ट ‘हिन्दू मैरिज एक्ट 1955’ |

हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 के क्रूर अध्याय को इतिहासकार लिखना भूल गये; या यूँ कहिये कि आधुनिक चाकलेटी इतिहासकारों नें इस अध्याय को ईमानदार विश्लेषण के साथ लिखना स्वार्थवश जरुरी नहीं समझा और आज तक नहीं समझा |

मेरा यह लेख, जनमानस से छिपा लिए गए इसी ‘हिन्दू मैरिज एक्ट 1955’ की असलियत, और भारतीय सनातनी परिवार व्यवस्था के इसी इसी महा-विनाशकारी इतिहास की शुरुवात का खुलासा करने का एक प्रयास है |

क्रमशः

डॉ सुनील वर्मा…..

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नोट: इस सीरीज का अगला लेख तब ही लिख पाऊंगा अगर इस लेख को मेरी रीडरशिप कुछ काम का समझ कर उचित सम्मान देते हुए discuss करती है, और अपने विचार के साथ शेयर करती है | बस इतनी ही सपोर्ट अपेक्षित है| इसके आभाव में अगली कड़ी लिखना संभव नहीं होगा