सावरकर

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जिन सावरकर जी की लिखी पंक्तियाँ अंदमान जेल से पिछली सरकार ने उखाड़कर फेंक दी थीं, उसी अंदमान जेल में जाकर देश का प्रधानमंत्री सावरकर जी की स्मृति में शीश झुकाता है, ये भी मेरे लिए अच्छे दिन हैं।

नकारात्मक विचारों वाले लोग इस बात का हिसाब लगाने और शिकायती स्वर में रोते रहने के लिए स्वतंत्र हैं कि इस सरकार ने क्या-क्या काम नहीं किए। मैं हर मामले में सकारात्मक पहलू को देखने वाला व्यक्ति हूँ और मेरा ध्यान इसी बात पर रहता है कि कहाँ क्या अच्छा हो रहा है। पिछली सरकार से भी मेरी नाराज़गी इस बात के लिए नहीं थी कि वह कांग्रेस की सरकार थी, बल्कि इस बात को लेकर थी कि वह सरकार लगातार देश का नुकसान करने वाले काम करती जा रही थी और वर्तमान सरकार के लिए भी मेरा समर्थन इस कारण नहीं है कि यह भाजपा की सरकार है, बल्कि इस कारण है कि यह सरकार हमेशा देश के हित में काम कर रही है।

सफलता-विफलता तो जीवन के अभिन्न अंग हैं। हर काम में सफलता तो किसी को भी नहीं मिल सकती। यह सरकार भी कई मामलों में अभी तक पूरी तरह सफल नहीं हो पाई है, लेकिन सफलता-विफलता से ज़्यादा महत्वपूर्ण बात नीयत की होती है। इस सरकार का समर्थन मैं इसलिए करता हूँ क्योंकि मुझे इस सरकार की नीयत पर भरोसा है। सरकार ने जो भी काम किए हैं, गलत इरादों से नहीं किए हैं, ये मेरे लिए सबसे बड़ी बात है। जो काम शुरू नहीं हो पाए या अभी तक पूरे नहीं हो पाए हैं, वे देर-सवेर शुरू भी हो जाएँगे और पूरे भी हो जाएँगे, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है। हज़ारों सालों के इतिहास में पाँच-दस वर्षों का कालखंड कोई मायने नहीं रखता। कोई बड़ी इमारत, बड़ा पुल, बड़ा बाँध, बड़ी प्रतिमा, बड़ा हवाई अड्डा भी बनाना हो, तो कुछ साल लग ही जाते हैं। लोग पाई-पाई जोड़कर अपना मकान बनाते हैं, तो वह भी रातों-रात नहीं बन जाता, उसमें भी कुछ साल लग ही जाते हैं। फिर जब राष्ट्र-निर्माण का कार्य रातों-रात कैसे पूरा हो सकता है? पूरे देश का कायापलट सिर्फ २-४ सालों में कैसे हो सकता है? इसमें समय तो लगेगा ही और मैं इस सरकार को उसके लिए पूरा समय देने को पूरी तरह तैयार हूँ। आपके मन में सबक सिखाने या नोटा दबाने की चाहत हो सकती है, लेकिन मेरे मन में ऐसा कोई उतावलापन, ऐसा कोई संशय बिल्कुल नहीं है।

सहमति-असहमति होना स्वाभाविक है, अपेक्षित है और वाजिब भी है। दुनिया में शायद ऐसा कोई समझदार व्यक्ति नहीं होगा, जो सामने वाले की हर बात से हमेशा सहमत ही रहता हो। अपने माता-पिता से, परिवार से, भाई-बहनों से, पति/पत्नी से, बच्चों से और दोस्तों से भी कई बातों में सहमति या असहमति रहती ही है। लेकिन इसका ये मतलब नहीं है कि लोग रिश्ते ही तोड़ देते हैं या विरोधियों के साथ मिलकर अपने परिवार को ही मिटाने पर अड़ जाते हैं। इतिहास में जिसने भी ऐसा किया है, उसको कभी भी कहीं भी सम्मान नहीं मिला। यहाँ तक कि विभीषण ने तो श्रीराम का साथ दिया था, लेकिन उसे भी इतिहास ने कोई सम्मान नहीं दिया। मंदिरों में आज भी राम, लक्ष्मण, सीता, और हनुमान की ही पूजा होती है, विभीषण की नहीं।

परिवार के लोगों से अगर किसी बात पर असहमति हो जाए, तो मैं बन्द कमरे में बात करके मामला सुलझाता हूँ। कभी मेरी बात परिवार के लोग मान लेते हैं, कभी उनका पक्ष सही लगने पर मैं झुक जाता हूँ। लेकिन परिवार का विवाद मैं चौक पर चिल्लाकर नहीं सुलझाता या परिवार में मेरी कोई बात न मानी जाए, तो मैं सड़क पर खड़ा होकर अपने ही लोगों को गालियाँ देने की मूर्खता नहीं करता।

सरकार से भी कई मामलों में मेरी असहमति रहती है। लेकिन उसके लिए भी मैं रोज़ सुबह-शाम सोशल मीडिया पर आकर शोर मचाने और मुझ पर भरोसा रखने वाले लोगों को भटकाने की मूर्खता नहीं करता। सरकार तक अपनी बात पहुँचाने के लिए कई माध्यम उपलब्ध हैं। मैं सही विकल्प का उपयोग करके सही लोगों तक अपनी बात पहुँचाता हूँ और कई मामलों में मैंने देखा है कि मेरी बात पर ध्यान दिया जाता है या मुझे ऐसा न करने का उचित कारण बताया जाता है। मेरे लिए इतना भी काफी है कि सरकार आम नागरिक की बात सुनती है और जनता के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी समझती है।

जो बात परिवार और सरकार के मामले में लागू होती है, वही बात इतिहास और महापुरुषों के मामले में भी लागू होती है। ये ज़रूरी नहीं है कि इतिहास की हर घटना से या किसी ऐतिहासिक व्यक्ति के हर विचार से मैं सहमत ही रहूँ। लेकिन असहमति का अर्थ अपमान नहीं होता। सावरकर जी के भी कई विचारों से मेरी असहमति है, लेकिन कोई अगर कहे कि देश की स्वतंत्रता के लिए उनका कोई योगदान ही नहीं था, तो मैं ऐसा कहने वालों से कभी सहमत नहीं हो सकता। देश को आज़ादी किसी एक व्यक्ति, एक परिवार या एक पार्टी ने नहीं दिलाई। लाखों लोगों ने सैकड़ों वर्षों तक लगातार संघर्ष करके आज़ादी हासिल की थी और सावरकर जी जैसे हज़ारों लोगों ने अपनी वाणी, विचार और कार्य से इसके लिए प्रेरणा दी। भारत की आज़ादी में गांधी-नेहरू का भी योगदान था और सावरकर-तिलक-बोस जैसे नेताओं का भी योगदान था। मैं सारा श्रेय किसी एक ही विचारधारा के लोगों को देने की धूर्तता नहीं कर सकता।

लेकिन काँग्रेस और वामपंथी पिछले सत्तर वर्षों से लगातार यही धूर्तता करते रहे हैं। उनको ये मंज़ूर ही नहीं कि एक खास टोली के अलावा और किसी को भी देश की आज़ादी का श्रेय मिले। इसलिए वे इतिहास के उन पन्नों को ही मिटा देना चाहते हैं, जिन पर उस टोली के अलावा किसी और का नाम लिखा हो। नेताजी सुभाष चंद्र बोस और सरदार पटेल जैसों की उपेक्षा करना या अंदमान से सावरकर जी की कविताओं को उखाड़ फेंकना उसी कुत्सित प्रयास का हिस्सा था। यह गलत नीयत ही काँग्रेस और वामपंथियों से मेरी असहमति का एक बड़ा कारण है। दूसरी ओर मोदी सरकार से मेरी सहमति का एक बड़ा कारण भी यही है कि इस सरकार में गाँधी से लेकर सावरकर तक और नेताजी सुभाषचंद्र बोस से लेकर सरदार पटेल तक हर महापुरुष का सम्मान हो रहा है। किसी को अपशब्दों से अपमानित करने का ओछापन इस सरकार में नहीं हो रहा है। मेरे नज़रों में यह भी बहुत बड़ी बात है। मैं इसके लिए भी इस सरकार का आभारी हूँ।

इन बातों का महत्व न समझ सकने वाले लोग मुझसे असहमत होने और कोई न कोई कारण ढूंढकर सरकार को कोसते रहने के लिए स्वतंत्र हैं। सादर!