जिस दिन “बामियान” में बुद्ध की मूर्ति तोड़ी गई

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जिस दिन “बामियान” में बुद्ध की मूर्ति तोड़ी गई, मेरे दिल में जैसे दु:ख से एक छेद हो गया!

और जिस दिन मैंने सांची में “बोधिसत्व” की खंडित प्रतिमा देखी, मेरे दिल में घर किए हुए उस शोक का परिविस्तार ही हुआ।

जहां-जहां मैं “शालभंजिका” की भग्न मूर्ति देखता, मेरे मन को ठेस ही पहुंचती, हर्ष नहीं होता।

मेरे कोमल और सम्वेदनशील मन की अति तो यह है कि “रावण” का पुतला जलाए जाने पर भी मुझको दु:ख ही होता है!

यह पोस्ट त्रिपुरा में लेनिन का पुतला ध्वस्त किए जाने पर है।

यह इस विषय पर मेरी चौथी पोस्ट है। और क्या ही रंज है कि मेरे जैसे सौंदर्योपासक, शिल्पसिद्ध, रीतिबद्ध, प्रतिमापूजक के बारे में यह कहा जा रहा है कि लेनिन का पुतला गिराए जाने पर मेरे मन में हर्ष है!

वास्तव में, इन चार पोस्ट में एक भी पंक्ति ऐसी नहीं है, जो यह सिद्ध कर सके कि मुझे लेनिन का पुतला गिराए जाने पर ख़ुशी हुई है।

मैंने इतना भर ही कहा है कि जब आप स्वयम् “तोड़फोड़ का सौंदर्यशास्त्र” रचते हैं तो यह बहुत सम्भव और स्वाभाविक है कि किसी दिन आप भी उसके शिकार हों जाएं। यही इतिहास का चक्र है।

“बोल्शेविकों” ने क्रांति के बाद रूस में ज़ार की प्रतिमा गिरा दी थी, अब बोल्शेविकों के ख़ुदा लेनिन का पुतला ढहा दिया गया। इसमें उचित और अनुचित का भेद क्या? यह तो अवश्यम्भावी की वर्तनी है।

जिसको कि अंग्रेज़ी में कहते हैं- “दे हैड इट कमिंग”। अर्थात् – “उनके साथ तो यह होना ही था।”

अंग्रेज़ी में एक और कहावत है- “वॉट गोज़ अराउंड कम्ज़ अराउंड।” अर्थात् – “जैसी करनी, वैसी भरनी।” “जैसे को तैसा।” इसमें कहीं भी उचित-अनुचित का भेद नहीं है, केवल एक सत्य का प्रकाशन है।

त्रिपुरा में लेनिन का पुतला गिरा दिया तो क्या हुआ? “दे हैड इट कमिंग।” उनके साथ तो यह होना ही था।

अंग्रेज़ी में एक बहुत मज़ेदार शब्द है- “आइकनोक्लास्ट।” इसको हिंदी में कहेंगे- “प्रतिमाभंजक”।

अंग्रेज़ी में “आइकनोक्लास्ट” क्रांतिचेता और विप्लवी का पर्याय बन गया है।

बहुत ही मज़े की बात है, “आइकनोक्लास्ट” शब्द का इस्तेमाल वो लोग प्रशस्ति के रूप में करते हैं, भर्त्सना के रूप में नहीं। यानी जब वे कहते हैं कि फलां व्यक्ति “आइकनोक्लास्ट” यानी “प्रतिमाभंजक” है, तो वो उसकी सराहना कर रहे होते हैं, निंदा नहीं। इस शब्द को अंग्रेज़ी में “रेबेल” और “रिवोल्यूशनरी” जैसी ही गरिमा प्राप्त है।

इसको ऐसे भी कह सकते हैं- “लेनिन वॉज़ एन आइकनोक्लास्ट”। अर्थात- “श्री लेनिन प्रतिमाभंजक थे।”

कालांतर में कुछ अन्य “आइकनोक्लास्टों” ने स्वयम् लेनिन की प्रतिमा खंडित कर दी। सो वॉट? “वॉट गोज़ अराउंड कम्ज़ अराउंड।” “जैसी करनी, वैसी भरनी।” यही तो “काव्य-न्याय” है, “पोएटिक जस्टिस” है। इसको खेलभावना से स्वीकार करो। कम ऑन कॉमरेड, बी कंसिस्टेंट एंड रैशनल!

और उससे पहले यह तय कर लो कि “आइकनोक्लास्ट” होना अच्छा होता है या बुरा? यह उचित है या अनुचित? नायकत्व है या प्रतिनायकत्व? मन में दुविधा मत रखो। जब आप किसी की प्रतिमा तोड़ो तो अच्छा और जब आपकी टूट जाए तो बुरा, वैसा भेद मत रखो।

दूसरे, यह भी कहा था कि जब आप “पीपुल्स रिवोल्यूशन” का दम भरते हैं, तो “व्यक्तिपूजा” का पाखंड मत कीजिए। बहुत ही सीधी-सी बात कही थी। कहीं पर भी संशय नहीं था।

सुना है, बाद उसके पेरियार और आंबेडकर की भी प्रतिमाओं को खंडित कर दिया गया। यह सुनकर मुझे कितना खेद है, बतला नहीं सकता।

क्योंकि, रावण का पुतला भी जलता है तो मेरे मन को कष्ट होता है, फिर यह तो लेनिन, पेरियार, आंबेडकर हैं!

किसी की भी प्रतिमा क्यूं खंडित की जानी चाहिए? यह कोई तरीक़ा थोड़े ना होता है?

उल्टे, मैं तो कहूंगा, प्रतिमाएं बनाई जानी चाहिए। “बुतपरस्ती” को क़ानून घोषित कर दिया जाए और बुतों को तोड़े जाने को “कुफ्र”।

क्या ही अच्छा हो कि लेनिन के खंडित पुतले के समक्ष हम सभी मिलकर यह शपथ लें कि इतिहास में जितनी भी प्रतिमाएं खंडित की गई हैं, हम आज उनके अपराधियों से मुख से भी क्षमाचायना सुनना चाहेंगे।

क्यों नहीं हो सकता? बिलकुल हो सकता है। होना ही चाहिए। प्रयास करके तो देखिये।

सुशोभित