कर्ण सर्वश्रेष्ठ योध्दा

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कर्ण अपने समय का सर्वश्रेष्ठ योध्दा था ,अर्जुन से कही अधिक उसमे कला निपुणता थी और जीतने की ललक भी ! अनचाहे दुर्भाग्य से उपजा उसका क्रोध का वेग उसके बाणो में झलकता था ! वह और अर्जुन लगभग एक से पारंगत योध्दा थे ! उसे अर्जुन को हरा कर यह साबित करना था की भाग्यवश जन्म से कोई महान नहीं होता कर्म की अपनी महत्ता हैं !

लेकिन फिर भी न जाने क्यों वह अपने अर्जुन संग हुए युध्द में वह अपनी योग्यता अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पा रहा था ! वह लड़ता तो था लेकिन मन में असमंजस लिए ! अर्जुन अपनी मनोदशा से उबर चुका था ,उसे कृष्ण जी ने शाश्वत स्वरूप में महान दर्शन शास्त्र का ज्ञान कराया था और अब उसके सामने दुर्योधन कर्ण के प्रति प्रतिशोध की ज्वाला धधक रही थी !
अब उसके सामने रिश्तेदारों की फौज नहीं बल्कि द्रौपदी का अपमान और अभिमन्यु के शव थे ! लेकिन कर्ण में वह प्रतिशोध और जीतने की भूख कमजोर होते जा रही थी ,कुंती से मिलने के बाद ! हालांकि उसने माता कुंती को वचन दिया था की वह पाँच पुत्रो की माँ हमेशा रहेगी !

कर्ण को मारने में अर्जुन ने सिर्फ बाण चलाया था उसे प्रेरित कृष्ण ने किया था ! कर्ण को मारने में एक और शख्स भूमिका भी कम नहीं थी ! वह थे पांडवो का मामा मद्र नरेश शल्य ! जो कर्ण के भी सारथी बने था ! शल्य रथ कर्ण का चला रहे थे लेकिन उसके मन में अर्जुन के बाणो का बखान भी करते जा रहे थे ! वह अर्जुन की तारीफे कर कर्ण के मन में विचलन पैदा करते जाते ! खीज, कुंठा, हताशा को उसने कर्ण के भीतर इस तरह गुपचुप भरना शुरू कर दिया की कर्ण की नजर में अर्जुन का स्वरूप बढ़ा होते गया !

अंत में निर्णायक क्षणों में जब कर्ण के रथ का पहिया जमींन में धस गया तो महारथी कर्ण को नीचे उतर कर पहिये को खींचना पड़ा जबकि यह काम सारथी ने करना चाहिए था ! सारथी बने शल्य चाहते तो अन्य सैनिको को मदद बुला कर भी कर्ण की मदद कर सकते थे ! लेकिन उनके मन में कही न कहीं पांडवो के प्रति अनुराग उपजा हुआ था ! वह भी यह मानते थे की पांडवो संग बुरा हुआ हैं ! उन्हें पहले न्यौते के कारण कौरवो की तरफ से लड़ना पड़ा था ! इस तरह गलत सारथी के चयन से महारथी कर्ण का दुखद अवसान हुआ था !

अब निंदक नियरे राखिये का जमाना नहीं रहा ! अपनी टीम में सारथी (दोस्त) भरोसेमंद और समान विचारधारा के ही होना चाहिए !भाजपा में शत्रुघ्न सिन्हा जैसे बने रह कर भी क्या योगदान देते हैं ?? बल्कि हमेशा विषवमन ही करते हैं , मखौल उड़ाते रहते और अपने बड़बोलेपन को अभिव्यक्ति का नाम भी दे देते हैं ! इनके स्टेटमेंट पढ़ कर गुस्सा भी आता और खीज भी ! लेकिन इसके लिए कुछ कर नहीं सकते आप हम ! हाँ हम यह काम बखूबी कर सकते की अपनी अपनी मित्र सूचियों से ऐसे ही शल्य को खोज खोज कर निकाले जो अपने आपको कहते तो राष्ट्रवादी लेकिन उनके विषवमन हमेशा अपनी ही टीम के खिलाफ होते रहता हैं !

कर्ण का मद्र नरेश शल्य का लिहाज करना समझ आता हैं , भाजपा की कोई रणनीतिक मजबूरी हो सकती शत्रुघ्न सिन्हा जैसे को लेकर ! लेकिन हमारी क्या मजबूरी हैं ,आस्तीन के सांपो को पालने की ??? 19 के निर्णायक चुनावों के लिए अपनी अपनी आस्तीन झटक दीजिये ! सांपो को दूध पिलाने से वह अमृत नहीं बरसाते

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