ऐतिहासिक धरोहर की पूरी कहानी को सिलसिलेवार

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एक मास पूर्व मैंने वसंतोत्सव पर वाग्देवी की उस प्रतिमा के बारे में बताया था जिसे अंग्रेज धार से उठाकर लन्दन ले गए थे। आज से मैं अपने देश से लूटी गई कला-सम्पदा और ऐतिहासिक धरोहर की पूरी कहानी को सिलसिलेवार प्रस्तुत करूंगा।

विगत दो हज़ार वर्षों की अवधि में भारत पर सैकड़ों विदेशी हमले हुए और देश को आठ शताब्दियों तक पराधीनता का दंश झेलना पड़ा। लगभग छः शताब्दियों के इस्लामी शासनकाल में आक्रांताओं द्वारा भारत की धन-सम्पदा की बेतहाशा लूट-खसोट हुई। मुसलमान शासक और आक्रमणकारी धन के भूखे थे और उनके लिए पत्थरों और दीवारों पर उत्कीर्ण कलाकृतियों और मूर्तियों का मूल्य उनको तोड़कर मस्जिदों की सीढ़ियों पर लगाने और काफिरों को लज्जित करने के सिवा कुछ और न था। दूसरी ओर व्यापारी के वेश में भारत आए अंग्रेज़ और फ्रांसीसी दुनियाभर के देशों से सुन्दर कला-सम्पदा को बटोरकर उसे लन्दन और पेरिस के संग्रहालयों में प्रदर्शित करना अपना अधिकार समझते थे।

ऐसा नहीं था कि ब्रिटेन के संग्रहालयों को सजाने के लिए भारतीय कला-सम्पदा की लूट, अंग्रेज़ों का धन के लिए लालच कहा जा सकता है। बल्कि 18वीं शताब्दी के अन्त से ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकारियों के सिर पर पुरानी भारतीय मूर्तियों, कलाकृतियों, चित्रों और पाण्डुलिपियों को बटोरने का एक जुनून सवार था। साथ ही वे भारतीय इतिहास और संस्कृति का विदेशी संस्कृति के साथ तुलनात्मक अध्ययन भी कर रहे थे। भारत पर दो शताब्दियों तक शासन के दौरान उन्होंने भारत की असंख्य अनमोल प्रतिमाओं, पुरातात्त्विक धरोहरों, कीमती कलाकृतियों, आभूषणों, पाण्डुलिपियों, आदि को संरक्षित करने के बहाने इंग्लैण्ड के तमाम संग्रहालयों में भर दिया।

जबकि हमें बताया जाता है कि यूरोपीयों ने भारत के मन्दिरों, महलों और अन्य प्राचीन स्मारकों को कभी कोई क्षति नहीं पहुँचाई, उलटे ‘एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल’, ‘आर्कियोलॉज़िकल सर्वे ऑफ़ इण्डिया’ और ‘सर्वे ऑफ़ इण्डिया’-जैसी संस्थाओं की स्थापना करके भारत की पुरातात्त्विक वस्तुओं के संरक्षण का कार्य किया, जबकि सत्य इसके ठीक विपरीत है।

वैसे तो 19वीं शताब्दी के प्रारम्भिक दशक से ही अनेक ब्रिटिश पुरातत्त्ववेत्ता भारत के भिन्न-भिन्न स्थानों पर पुरातात्त्विक अवशेषों की खोज कर रहे थे, लेकिन दिसम्बर, 1861 में सर अलेक्जेंडर कनिंघम के नेतृत्व में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण की स्थापना के बाद संगठित और व्यवस्थित तरीके़ से भारतीय कला-सम्पदा की लूट प्रारम्भ हुई। कनिंघम के समय में भारत के दूर-दराज क्षेत्रों में पुरातात्त्विक अवशेषों की खोज प्रारम्भ हुई। राजकीय संरक्षण में यूरोपीय प्राच्यविदों, कलापारखियों और पुरातत्त्ववेत्ताओं के अनेक खोजी-दल भेजे गए और विशाल मात्रा में कलाकृतियाँ एकत्र की गयीं। उनमें से नायाब कलाकृतियों को संरक्षित करने के बहाने उन्होंने लन्दन भेजने का प्रयास किया। इस तरह हज़ारों मूर्तियाँ, सिक्के, मुहरें, पेंटिंग्स, पाण्डुलिपियाँ, किताबें, बरतन, तलवारें, आभूषण, हीरे-जवाहरात, आदि विदेशी संग्रहालयों में पहुँचा दी गयीं।

सन् 1904 से पहले भारत में कोई संग्रहालय न था। 1904 में पहली बार सर जॉन मार्शल ने सारनाथ संग्रहालय की स्थापना की और तभी से यह प्रयास शुरू हुआ कि ‘प्राचीन स्थलों से प्राप्त किए गए पुरावशेषों को उन खण्डहरों के निकट सम्पर्क में रखा जाए, जिससे वे सम्बन्धित हैं, ताकि उनके स्वाभाविक वातावरण में उनका अध्ययन किया जा सके और स्थानान्तरित हो जाने के कारण उन पर से ध्यान हट नहीं जाये।’ लेकिन तब तक अंग्रेज़ अनेक महत्त्वपूर्ण कलाकृतियों को अपने देश ले जाने में सफल हो गये।

यदि अंग्रेज़ों का वश चलता, तो ये कोणार्क का सूर्य मन्दिर, खजुराहो के मन्दिर और एलोरा के कैलास मन्दिर को जहाज पर लादकर लन्दन ले जाते। जी हाँ, चौंकिये मत। यहाँ हम दो उदाहरण दे रहे हैं। पहला, वेल्लोर, तामिळनाडु के ‘कल्याणमण्डपम्’ की स्थापना 16वीं शताब्दी में विजयनगर-नरेश सदाशिवराय के शासनकाल के अंत में हुई थी। सुप्रसिद्ध कला-इतिहासकार पर्सी ब्राउन ने इस मन्दिर को ‘म्यूजियम बाई इटसेल्फ’ यानी ‘कला का प्रत्यक्ष संग्रहालय’ कहा था। अत्यंत अलंकृत स्तम्भोंवाला यह मन्दिर इतना सुन्दर था कि ईस्ट इण्डिया कंपनी के गवर्नर ने इस पूरे मन्दिर को ही लन्दन के ब्रिटिश म्यूजियम में स्थानांतरित करने की महत्त्वाकांक्षी योजना बना डाली। इसको ले जाने के लिए इंग्लैंड से एक जहाज भी चल पड़ा। लेकिन भारत के सौभाग्य से वह जहाज मार्ग में ही समुद्र में डूब गया। तब दूसरे जहाज की व्यवस्था की गयी। इसी बीच राजनीतिक चेतना के कारण यह योजना निष्फल हो गई और यह मण्डप यथावत् खड़ा रहा।

इसी प्रकार अंग्रेज़ों ने साँची के तोरणद्वारों को भी लन्दन ले जाने का एड़ी-चौटी का जोर लगाया। हालांकि इसमें भी उन्हें सफलता हाथ नहीं लग सकी। भोपाल में स्थित साँची का स्तूप ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक दृष्टि से अत्यधिक महत्त्वपूर्ण माना जाता है। लंका के ऐतिहासिक ग्रंथ ‘दीपवंश’ और ‘महावंश’ में भी इसका उल्लेख प्राप्त होता है। 1818 ई. की ग्रीष्म ऋतु में एक दिन एक ब्रिटिश सेनानायक जनरल टेलर जब साँची नामक ग्राम की एक पहाड़ी की चोटी पर पहुँचा, तो उसे वहाँ गुम्बद के समान एक विचित्र टीला दिखाई दिया। 1822 ई. में भोपाल राज्य के असिस्टेंट पॉलिटिकल एजेंट कैप्टन जॉनसन ने टीले के एक भाग की खुदाई प्रारम्भ करवायी। 1851 में सर अलेक्जेंडर कनिंघम ने अत्यन्त सावधानीपूर्वक खुदाई के कार्य को आगे बढ़ाया। 1881 ई. में पुरातत्त्ववेत्ता लेफ्टिनेंट एच.एच कोल ने साँची के खण्डहरों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से इसकी पहाड़ियों के ऊपर के भाग के जंगलों को साफ़ करवाया। 1912 ई. में भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के तत्कालीन महानिदेशक सर जॉन मार्शल ने साँची-स्तूप के उत्खनन-कार्य को आगे बढ़ाया। खण्डहरों के विभिन्न भागों को इकट्ठा करके स्तूप को मूल स्थिति में लाने का प्रयास किया गया। उन्नीसवीं शताब्दी के यूरोपियों का साँची के स्तूप के प्रति पर्याप्त आकर्षण था। सन् 1818 ई. में, जब साँची के स्तूप की खोज हुई, तो इसके तीन तोरणद्वार अपने स्थान पर खड़े थे। चौथा तोरणद्वार वहीं पर गिरा हुआ था और टीला भी अच्छी स्थिति में था। इन तोरणद्वारों में फ्रांसीसियों की विशेष रुचि थी। वे स्तूप के पूर्वी तोरणद्वार को, जो सबसे अच्छी स्थिति में था, फ्रांस के संग्रहालय में प्रदर्शित करना चाहते थे। उन्होंने भोपाल की तत्कालीन नवाब शाहजहाँ बेगम से इसे फ्रांस ले जाने की अनुमति मांगी। कुछ अंग्रेज़ भी इस तोरणद्वार को इंग्लैण्ड ले जाना चाहते थे। सौभाग्य से अंग्रेज़ और फ्रांसीसी- दोनों इस तोरणद्वार की अत्यधिक सावधानीपूर्वक बनाई गई प्लास्टर-प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए और इस प्रकार मूल संरचना साँची में अपने स्थान पर ही स्थित रही।

इस प्रकार भोपाल की नवाब बेगम द्वारा दिए गए योगदान और अन्य परिस्थितियों के अनुकूल होने के कारण यह महत्त्वपूर्ण विरासत नष्ट होने से बच गयी। सौभाग्य से यह स्तूप किसी रेल-ठेकेदार अथवा निर्माता की दृष्टि से भी बच गया, अन्यथा इसकी सामग्री का उपयोग रेल-लाइनों को बिछाने में अथवा किसी भवन को बनाने में कर लिया गया होता। सौभाग्यवश इसपर उन लोगों की दृष्टि भी नहीं पड़ी, जो ऐसी चीजों को चुपके-चुपके यूरोप के संग्रहालयों में पहुँचा देते थे। सबसे महत्त्वपूर्ण बात तो यह है कि इस समय एच.एच. कोल-जैसे कुछ पुरातत्त्ववेत्ता प्राचीन कलाकृतियों को उनके स्थान पर ही बने रहने पर जोर दे रहे थे। उनका विचार था कि मूल कृतियाँ खोज-स्थल पर ही रहनी चाहिये और संग्रहालयों में उनकी प्लास्टर-प्रतिकृतियाँ रखी जानी चाहिये। उन्होंने लिखा था, ‘इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।’

जो कोई भी ब्रिटेन की पहली यात्रा करता है, उसे वहाँ के भव्यातिव्य संग्रहालयों का अवलोकन करने की सलाह दी जाती है। ब्रिटेन के संग्रहालयों में लन्दन का ‘दी ब्रिटिश म्यूजियम’ दुनिया में सबसे बेहतरीन और सर्वाधिक प्रतिष्ठित समझा जाता है। 265 वर्ष पुराने इस संग्रहालय को देखने दुनियाभर से प्रतिवर्ष 60 लाख पर्यटक और शोधार्थी लन्दन आते हैं। ब्रिटेन में और भी कई संग्रहालय हैं, जहाँ आकर उन्हें मालूम होता है कि उनके देश की कितनी ही अमूल्य धरोहरों पर अंग्रेज़ों ने कितनी क्रूरता से हाथ साफ़ कर लिया और अब वे वस्तुएँ ब्रिटिश संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही हैं।

कहने को तो इन संग्रहालयों ने मूल देश से निर्यात लाइसेंस लिए बिना किसी वस्तु को प्राप्त न करने की सख्त नीति बना रखी है, लेकिन जब आप इन संग्रहालयों का कैटलॉग देखेंगे, तो आपकी आँखें फटी-की-फटी रह जायेंगी जब आपको यहाँ रखी भारतीय कला-सम्पदा की विशालता का पता लगेगा। ‘दी इण्डिया प्राइड प्रोजेक्ट’ नामक संस्था ने अनुमान लगाया है कि भारत की लगभग 70,000 अमूल्य कलाकृतियाँ चोरी होकर विदेशी संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही हैं। क्या इतनी सारी कलाकृतियों को लाइसेंस लेकर प्राप्त किया गया?

दुर्भाग्य से स्वतंत्र भारत की सरकारें विदेशी संग्रहालयों में अपनी राष्ट्रीय सम्पत्ति के विषय में बहुत उदासीन रही हैं और अपनी धरोहरों को छुड़ाने के लिए कभी भी ठोस कदम उठाने से कतराती रही हैं।

✍?
गुँजन अग्रवाल